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अभिषेकमैं अपने स्कूल के दिनों की बातें करूं तो मुझे गर्मियों के दिन प्यारे लगते थे। हम उन दिनों सरकारी क्वार्टर में रहते थे। गर्मियों की पूरी दोपहर हम खेल में बिता देते थे। पापा-मां के ऑफिस जाने के बाद दोपहर दो बजे तक हम लोग बरामदे में खेलते थे और जब धूप बढऩे लगती तो हम घर में आकर बोर्ड गेम्स खेलते थे। शाम को पेड़-पौधों को पानी देते थे। मिट्टी से उठती उस सोंधी खुशबू से मुझे प्यार था। एसी क्या, उन दिनों कूलर तक की कमी नहीं महसूस होती थी। मेरा पूरा मकान सकून से भरा था। उसकी एक वजह थी कि मेरे मकान के चारों तरफ पेड़ लगे थे। क्वार्टर के आगे अहाते में एक विशाल अमलताश का पेड़ था। अब ज़माना एसी का है। घरों में, दफ्तर में, गाडिय़ों में, दुकानों में एसी लगे हुए हैं। पहले लोग शाम को खुली हवा में बैठते थे, रातों को छतों पर सोते थे, लेकिन अब रातों को छतों पर सोना तो दूर, मकान की बालकनी खोल लोग शाम में भी बाहर बैठना पसंद नहीं करते। अब बालकनी और छत सिर्फ कपड़े सुखाने के काम आती हैं या पुराना सामान रखने के या फिर एयरकंडीशनर के एग्जॉस्ट को रखने के। दिल्ली में आप किसी भी छत पर चले जाइये, आपको सिर्फ एयरकंडीशनर के एग्जॉस्ट ही लगे दिखेंगे और छतें इस वजह से इतनी गर्म रहती हैं कि आप चैन से वहां खड़े भी नहीं हो पायेंगे।ये एयरकंडीशनर की बिक्री में जो क्रान्तिकारी बदलाव आया है, वो शुक्र है कि अभी आया है। बीते दिनों में लोग इसके आदी नहीं थे, वरना हमें ‘या गरमियों की रात जो पुरवाइयां चलेंज्ठंडी सफ़ेद चादरों पे जागें देर तकज्तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुएÓ जैसे गाने सुनने को मिलते नहीं। लोगों का अब गर्मी से पाला ही नहीं पड़ता। दिन भर एयरकंडीशन ऑफिस में बैठ कर काम करना, एसी गाडिय़ों से वापस घर आना और फिर घर में भी एसी में रहना। पहले इस तरह की लक्जरी सिर्फ हाई इनकम क्लास लोगों के पास थी। खैर तमाम तरह के इन परिवर्तनों के बीच मजा लीजिए इन पंक्तियों का-सन्नाटों में लिपटी वो दोपहर कहां अब, धूप में आधी रात का सन्नाटा रहता था। लू से झुलसी दिल्ली की दोपहर में अक्सर, चारपाई बुनने वाला जब आवाज लगाता। दो बजते-बजते जामुन वाला आवाज लगाता ठन्डेज् कालेज् जामुन। तीन बजे तक लू का सन्नाटा रहता था। चार बजे तक ‘लंगरी सोटाÓ पीसने लगता था ठंडाई। चार बजे के आसपास ही हापुड़ के पापड़ आते थे, बर्फ की सील पर सजने लगती थी गंडेरियां, केवड़ा छिड़का जाता था और छतों पर बिस्तर लग जाते थे जब ठंडे-ठंडे आसमान पर तारे छिटकने लगते थे!

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