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श्री राम (Lord Ram) के क्रोध से डरकर जब समुद्र स्‍वयं भगवान के सामने आता है तो कई तरह से विनय करता है. समुद्र के मुख से जो वचन तुलसीदास (Goswami Tulsidas) जी ने कहलाए थे, आज तक तुलसीदास जी को उन्‍हीं वचनों के कारण आलोचना झेलनी पड़ती है.

नई दिल्‍ली. दूरदर्शन पर चल रहे धारावाहिक रामायण ने लोगों के मन में इस धार्मिक कथा को लेकर नई नई जिज्ञासाएं पैदा की हैं. ताजा जिज्ञासा समुद्र के किरदार को लेकर चल रही है. भगवान राम ने जिस तरह से अपने सहज सौम्‍य स्‍वभाव के विपरीत जाकर समुद्र पर क्रोध किया, उसमें दर्शकों को खूब मजा आ रहा है. भगवान के क्रोध का वर्णन करते हुए रामचरितमानस में कहा गया- ‘विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीत, बोले राम सकोप तब भय बिन होय न प्रीत.’

भगवान के इस क्रोध से डरकर जब समुद्र स्‍वयं भगवान के सामने आता है तो कई तरह से विनय करता है. रामायण धारावाहिक में इस किरदार को असलम खान ने बड़ी गहराई से निभाया था. बहरहाल समुद्र के मुख से जो वचन तुलसीदास जी ने कहलाए थे, वे वचन आगे चलकर हमेशा के लिए विवाद का कारण बने और आज तक तुलसीदास जी को उन्‍हीं वचनों के कारण आलोचना झेलनी पड़ती है. दरअसल समुद्र ने भगवान से कहा, ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी.’

तुलसीदास जी ने यह संवाद समुद्र के मुख में परिस्थितियों के अनुरूप डाला था. जिसमें कातर समुद्र खुद को राम के कोप से बचाने के लिए कह रहा है कि उसका स्‍वभाव ही ढीठ है, ऐसे में उस पर कृपा होनी चाहिए.

लेकिन समुद्र के यह वचन अब सीधे तुलसीदास जी के पूर्वाग्रह के साथ जोड़े जाते हैं. इस चौपाई में शूद्रों को ताड़ना का अधिकारी बताने के लिए दलित समाज तुलसीदास की आलोचना करता है, तो स्‍त्री को ताड़ना का अधिकारी बताने के लिए महिला समानता के हिमायती तुलसीदास जी की आलोचना करते हैं. महाकाव्‍य की रचना करते समय तुलसीदास जी को अंदाजा नहीं रहा होगा, कि समुद्र के जिस किरदार को वे बहुत छोटी सी भूमिका अपनी रचना में दे रहे हैं, उसका एक संवाद उनके हजारों दूसरे संवाद पर भारी पड़ जाएगा.

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असल में तो तुलसीदास जी ने समुद्र का पूरा प्रसंग ही सांप्रदायिक एकता के लिए रचा था. उन्‍होंने रामेश्‍वरम में समुद्र किनारे भगवान राम के हाथ से शिवलिंग स्‍थापित कराया और शिव जी की पूजा की. इस तरह उन्‍होंने हिंदू धर्म के दो संप्रदाय वैष्‍णव संप्रदाय और शैव संप्रदाय के बीच की खाई को पाटा और यह परंपरा विकसित की कि दोनों संप्रदाय एक दूसरे के पूरक हैं और एक दूसरे का सम्‍मान करते हैं. मानस में बार बार भगवान राम और भगवान शिव एक दूसरे को अपना आराध्‍य बताते हैं.

इसी तरह तुलसीदास जी ने समुद्र पर पुल का निर्माण भी स्‍वयं भगवान राम के हाथ से न करवाकर भगवान विश्‍वकर्मा के पुत्रों नल और नील के हाथों कराया. भगवान विश्‍वकर्मा आज पिछड़े वर्ग की कुछ जातियों के पितृपुरुष माने जाते हैं और इंजीनियरिंग के सारे काम उनकी पूजा से शुरू होते हैं.

वैसे भी भारतीय धर्मग्रंथों की कोई कथा समुद्र के बिना पूरी नहीं होती है. यह समुद्र मंथन की ही कथा है, जिससे देव और दानवों को समुद्र में छिपे रत्‍नों की प्राप्ति हुई. यहीं से देवताओं को अमृत और देवराज इंद्र को ऐरावत हाथी मिला. इसी मंथन में मंद्राचल पर्वत को मथानी बनाया गया और वासुकी नाग का रस्‍सी की तरह प्रयोग किया. समुद्र मंथन में असुरों के हाथ से छीन लिया गया अमृत ही देव और दानवों के बीच सदा चली आने वाली लड़ाई का स्‍थायी कारण बना. समुद्र को लेकर कथाओं की कमी नहीं है. पाठक चाहें तो अगस्‍त्‍य मुनि द्वारा समुद्र को पी जाने की कथा भी खोजकर पढ़ें और यह भी खोजें की भगवान राम के किस पूर्वज ने समुद्र का निर्माण किया था. आगे जाकर उन्‍हें यह भी जानना होगा कि आखिर क्‍यों भारत में यह मान्‍यता प्रचलित हो गई कि समुद्र यात्रा नहीं करनी चाहिए. और यह मान्यता इतनी फैली कि जब महात्‍मा गांधी इंग्‍लैंड से पढ़कर समुद्र के रास्‍ते भारत वापस आए तो प्रायश्चित करने से इनकार करने पर उनकी बिरादरी ने उनका हुक्‍का पानी बंद कर दिया. बहरहाल हरि अनंत हरि कथा अनंता. सो अभी तो रामायण का ही सुख लीजिए

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