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सत्ता नहीं, जनता सर्वोपरि
चुनाव की दहलीज पर खड़ा अमेरिका इन दिनों आमजन के गुस्से की लपटों से घिरा है। अपने अजीबोगरीब बयानों के लिए सुर्खियों में रहने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर विवादित बयान देकर ‘गुस्से की आगÓ को और हवा दे दी। हालांकि ह्यूस्टन के पुलिस प्रमुख आर्ट एसिविडो ने ट्रंप के बयान पर आपत्ति जताते हुए साफ कहा, ‘अगर आपके (ट्रंप के) पास मुद्दे से निपटने का कोई अच्छा सुझाव नहीं है तो कृपया अपना मुंह बंद रखें।Ó एसिविडो हालात की गंभीरता को समझ रहे हैं। इस वक्त अमेरिका के 150 से अधिक शहर हिंसा की चपेट में हैं। करीब 40 शहरों में कर्फ्यू लगा हुआ है। अब तक अरबों डॉलर की संपत्ति नष्ट हो चुकी है। अनेक लोग और पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। विरोध प्रदर्शनों की लपटों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका के 28 राज्यों और वाशिंगटन डीसी में 21 हजार के करीब सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं। असल में, हिंसा तब भड़की, जब अफ्रीकी मूल के अमेरिकी निवासी 46 वर्षीय एथलीट जॉर्ज फ्लॉयड के प्रति एक पुलिस अधिकारी की बर्बरता का वीडियो वायरल हुआ। श्वेत पुलिस अफसर डेरेक चौविन ने फ्लॉयड को जमीन पर पटका और उसकी गर्दन पर घुटना रख दिया। फ्लॉयड का दम घुटता रहा और अफसर की क्रूरता जारी रही। एक राहगीर ने पूरी वारदात का वीडियो बना लिया। फ्लॉयड की मौत और वीडियो के वायरल होने के बाद जनता भड़क गयी। अमेरिका के मिनियापोलिस शहर से उठीं गुस्से की लपटें वाशिंगटन स्थित ‘व्हाइट हाउसÓ तक पहुंच गयीं। मामला इस कदर गंभीर हो गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति को विशेष तौर पर तैयार बंकर में पहुंचाना पड़ा। कोरोना महामारी के दौर में बिना सोशल डिस्टेंसिंग और बिना मास्क पहने हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों ने सरकार को सकते में डाल दिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों की तुलना फासीवादियों से कर डाली और प्रभावित शहरों में सेना तैनात करने की चेतावनी भी दे दी।
बेशक, हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकता और प्रदर्शन की आड़ में लूटपाट की इजाजत नहीं दी जा सकती, लेकिन जनता के उस बड़े वर्ग की चिंता को समझना सरकार की जिम्मेदारी है जो भेदभावपूर्ण व्यवहार को कतई बर्दाश्त नहीं करने का संदेश दे रहा है। अमेरिका में रंगभेद हिंसा का यह कोई पहला मामला नहीं है। पहले भी, कभी छिटपुट तो कभी बड़ी वारदातें हुई हैं। इस वक्त पुलिस अफसर की क्रूरता के बाद जिस तरह से पूरे विश्व से प्रतिक्रियाएं आई हैं, उससे अमेरिकी सरकार पर धब्बा तो लगा है। हालांकि कुछ बातें महत्वपूर्ण हैं जो अमेरिका को थोड़ा अलग बनाती हैं। फ्लॉयड की मौत के इस मामले में वहां न सिर्फ तमाम अमनपसंद लोगों ने प्रतिक्रियाएं दीं, बल्कि संस्थानों ने अपनी जिम्मेदारी निभायी। आरोपी अफसर चौविन को तुरंत नौकरी से निकाल दिया गया और गिरफ्तार भी कर लिया गया। उन पर थर्ड-डिग्री के इस्तेमाल और हत्या का आरोप लगाया गया, जिससे उन्हें 35 साल तक की कैद हो सकती है। दरअसल, हिंसा के दौर में राष्ट्रपति ट्रंप को भी जनता की भावनाओं को समझना चाहिए था और उसी हिसाब से प्रतिक्रिया देनी चाहिए थी। ट्रंप की बयानबाजी के बीच ह्यूस्टन पुलिस के प्रमुख आर्ट एसिविडो एक नायक के रूप में उभरे हैं जो ऐसी स्थिति में दिल जीतना जानते हैं। उन्होंने राष्ट्रपति को मुद्दे का सही हल तलाशने तक चुप रहने के लिए कह दिया। बहरहाल, ट्रंप दुनिया के सबसे ‘ताकतवरÓ राष्ट्र की सत्ता पर तो काबिज हो गए, लेकिन ऐसे नाजुक मौकों पर उन्हें अपने इस पुलिस अफसर से सीखना चाहिए कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मामले से कैसे निपटा जाना चाहिए। कमोबेश यही संदेश अन्य देशों के उन नेताओं के लिए भी है जो सत्ता सौंपने वाली जनता को, सत्ता पर काबिज होने के बाद या तो भूल जाते हैं या फिर विरोध करने के उनके अधिकारों पर कुठाराघात करते हैं। सत्ता के मद में जनता को भूलने वालों का हश्र भी दुनिया ने देखा है।
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