किसान का दर्द राष्ट्र का दर्द है, अनदेखी क्यों


कड़ाके की सर्दी पड़ रही है, दिल्ली में पिछले 40 दिनों से किसान धरना दे रहे हैं कि कृषि बिल वापस लो। सरकार को अब जुल्म की सरकार नहीं बनना चाहिए।

देश के विपक्षी, किसान, बुद्धिजीवी, आम नागरिकों में इस बात की चिंता बढ़ रही है कि सरकार के नेता अहंकारी हो गए हैं।

एक लोकतांत्रिक देश में सरकार का अहंकारी रवैया नागरिकों के लिए बहुत पीड़ाजनक हो जाता है। सरकार का चुनाव इसलिए किया जाता है

कि वह अपने देश व नागरिकों की फिक्र करेगी। देशवासियों को उनकी पीड़ा से उभारेगी। कोई भी साथ नहीं देगा तो सरकार तो सुनेगी ही सुनेगी।

लेकिन यह बेहद अफसोस की बात है कि सरकार अपने लोगों की बात को इस नीति पर अनसुना कर रही है कि लोग थक-हारकर चुप हो जाएंगे।

भारत की ग्रामीण आबादी किसी वक्त आत्मनिर्भर थी, बल्कि गांवों ने शहरी अर्थव्यवस्था को गति दे रखी थी।
महात्मा गांधी का सपना भी रहा है कि देश के ग्राम आत्मनिर्भर बनें जोकि सदियों की अंग्रेजी सरकार के चलते सरकार पर निर्भर हो गए थे।

भाजपा का भी सपना है ‘अंतोदयÓ। अंत से उदय तभी संभव है जब अंतिम व्यक्ति को स्वयं के सहारे खड़ा होने का सहयोग दिया जाए।

पूंजीगत अर्थव्यवस्था को भारत के गांवों में खुला प्रवेश देने से न केवल भाजपा का ‘अंतोदयÓ सपना बिखरेगा बल्कि महात्मा गांधी का राष्ट: के गांवों को स्वावलंबी बनाने का प्रयास दम तोड़ जाएगा।

जब से देश में उदारीकरण की हवा चली है देश के खेतों पर बड़े शहर, बड़े-बड़े हाइवे, अवैध कॉलोनियां पसर गई हैं। गांवों को रौंदकर शहरों को रोशन किया जा रहा है

, ये नीतियां रोकी जानी चाहिए।
भाजपा से उम्मीद थी कि जो गलतियां कांग्रेस ने की है उनसे भाजपा बचाएगी लेकिन भाजपा ने गलत नीतियों की रफ्तार को मानों पंख ही लगा दिए हैं।

अभी क्या हो जाएगा अगर सरकार कृषि बिलों को वापिस ले लेती है? किसान संगठनों से भविष्य की कृषि पर चर्चा कर सरकार नए बिल ले जाए जिनसे देश की अर्थव्यवस्था भी बढ़े, गांव व खेतों का भी नुक्सान न हो।

केन्द्र सरकार को चाहिए कि वह वर्तमान विरोध को पंजाब का ही विरोध नहीं समझे, ये किसानों का विरोध है। अगर एक भी किसान देश में सरकार की वजह से आहत है

तो उसका दर्द सरकार को सुनकर उसके दर्द को दूर करना चाहिए।


इस भयंकर सर्दी में जब नेता व अफसर अपने कार्यालयों व गाडिय़ों में हीटर चलाकर काम करना चाहते हें तब देश का किसान जो सड़क पर खुले आसमान के नीचे अपने परिवार जिसमें बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं भी हैं

, खेतों में भी उसके पास सुविधा नहीं है, तब वह किस पीड़ा से गुजर रहा है, किसानों को अनदेखा नहीं किया जाए भले ही इन किसानों ने भाजपा को वोट नहीं देना या भाजपा का वोट शहर का है,

तब भी यह क्षुद्र राजनीति न हो कि वोट नहीं तो सुनवाई नहीं। समस्या राष्ट: की है, दर्द राष्ट: का है

उसे लाभहानि व वोट की नजर से न देखा जाए।

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